Gulzar Poetry | ज़ुबान पर ज़ाएका आता था | Zuban par Zaika aata tha

ज़ुबान पर ज़ाएका आता था जो सफ़हे पलटने का

अब उँगली ‘क्लिक’ करने से बस इक

झपकी गुज़रती है

बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर

किताबों से जो जाती राब्ता था, कट गया है

कभी सीने पे रख के लेट जाते थे

Gulzar Poetry | अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो | Abhi n Parda Girao, Thaharo

अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो, कि दास्ताँ आगे और भी है
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!
अभी तो टूटी है कच्ची मिट्टी, अभी तो बस जिस्म ही गिरे हैं
अभी तो किरदार ही बुझे हैं।
अभी सुलगते हैं रूह के ग़म, अभी धड़कते हैं दर्द दिल के
अभी तो एहसास जी रहा है।

यह लौ बचा लो जो थक के किरदार की हथेली से गिर पड़ी है
यह लौ बचा लो यहीं से उठेगी जुस्तजू फिर बगूला बनकर
यहीं से उठेगा कोई किरदार फिर इसी रोशनी को लेकर
कहीं तो अंजाम-ओ-जुस्तजू के सिरे मिलेंगे
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!

Gulzar Poetry | सीधा सहल साफ़ है यह रस्ता | Sidha Sahal Saf hai yah Rasta

किस क़दर सीधा सहल साफ़ है यह रस्ता देखो
न किसी शाख़ का साया है, न दीवार की टेक
न किसी आँख की आहट, न किसी चेहरे का शोर
न कोई दाग़ जहाँ बैठ के सुस्ताए कोई
दूर तक कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं

चन्द क़दमों के निशाँ, हाँ, कभी मिलते हैं कहीं
साथ चलते हैं जो कुछ दूर फ़क़त चन्द क़दम
और फिर टूट के गिरते हैं यह कहते हुए
अपनी तनहाई लिये आप चलो, तन्हा, अकेले
साथ आए जो यहाँ, कोई नहीं, कोई नहीं
किस क़दर सीधा, सहल साफ़ है यह रस्ता

Gulzar Poetry | बर्फ़ पिघलेगी जब पहाड़ों से | Barf Pighalegi jab pahado se

बर्फ़ पिघलेगी जब पहाड़ों से

और वादी से कोहरा सिमटेगा

बीज अंगड़ाई लेके जागेंगे

अपनी अलसाई आँखें खोलेंगे

सब्ज़ा बह निकलेगा ढलानों पर

गौर से देखना बहारों में

पिछले मौसम के भी निशाँ होंगे

कोंपलों की उदास आँखों में

आँसुओं की नमी बची होगी।

Gulzar Poetry | सितारे लटके हुए हैं | Sitare latakte huae hai

सितारे लटके हुए हैं तागों से आस्माँ पर

चमकती चिंगारियाँ-सी चकरा रहीं आँखों की पुतलियों में

नज़र पे चिपके हुए हैं कुछ चिकने-चिकने से रोशनी के धब्बे

जो पलकें मुँदूँ तो चुभने लगती हैं रोशनी की सफ़ेद किरचें

 

मुझे मेरे मखमली अंधेरों की गोद में डाल दो उठाकर

चटकती आँखों पे घुप अंधेरों के फाये रख दो

यह रोशनी का उबलता लावा न अन्धा कर दे।

Gulzar Poetry | वक़्त को आते न जाते | Vakht ko Aate n jate

वक़्त को आते न जाते न गुजरते देखा
न उतरते हुए देखा कभी इलहाम की सूरत
जमा होते हुए एक जगह मगर देखा है

शायद आया था वो ख़्वाब से दबे पांव ही
और जब आया ख़्यालों को एहसास न था
आँख का रंग तुलु होते हुए देखा जिस दिन
मैंने चूमा था मगर वक़्त को पहचाना न था

चंद तुतलाते हुए बोलों में आहट सुनी
दूध का दांत गिरा था तो भी वहां देखा
बोस्की बेटी मेरी ,चिकनी-सी रेशम की डली
लिपटी लिपटाई हुई रेशम के तागों में पड़ी थी
मुझे एहसास ही नहीं था कि वहां वक़्त पड़ा है
पालना खोल के जब मैंने उतारा था उसे बिस्तर पर
लोरी के बोलों से एक बार छुआ था उसको
बढ़ते नाखूनों में हर बार तराशा भी था

चूड़ियाँ चढ़ती-उतरती थीं कलाई पे मुसलसल
और हाथों से उतरती कभी चढ़ती थी किताबें
मुझको मालूम नहीं था कि वहां वक़्त लिखा है

वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा
जमा होते हुए देखा मगर उसको मैंने
इस बरस बोस्की अठारह बरस की होगी