Gulzar Poetry | दरख़्त रोज़ शाम का | Darkht Roj Sham Ka

दरख़्त रोज़ शाम का बुरादा भर के शाखों में

पहाड़ी जंगलों के बाहर फेंक आते हैं !

मगर वो शाम…

फिर से लौट आती है, रात के अन्धेरे में

वो दिन उठा के पीठ पर

जिसे मैं जंगलों में आरियों से

शाख काट के गिरा के आया था !!

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